गोपेश्वर (चमोली)। सिद्धपीठ कुरूड़ से इस बार चलने वाली मां नंदा की बड़ी जात का मुहूर्त बसंत पंचमी को निकलेगा। इस बार किसी पंचांग गणना के जरिए नहीं अपितु मां नंदा किसी अवतारी पुरूष पर अवतरित होकर बड़ी जात पर रूख स्पष्ट करेगी। इसके चलते सबकी निगाहें बसंत पंचमी पर निकाले वाले मुहूर्त टिक गई है।

दरअसल हिमालयी सचल महाकुंभ के रूप में विख्यात नंदादेवी राजजात यात्रा विवादों घिर गई है। कांसुवा-नौटी से निकाले वाली राजजात यात्रा को लेकर आयोजन समिति ने मलमास का हवाला देते हुए इस साल की यात्रा को स्थगित करने की घोषणा कर दी है। नंदा की बड़ी जात को सिद्धपीठ कुरूड़ से इसी साल आयोजित करने को लेकर लोग अड़े हुए हैं। हालांकि बसंत पंचमी पर्व पर मुहूर्त (दिन पट्टा) निकलेगा। इस बार किसी पंचांग गणना से नहीं अपितु किसी अवतारी पुरूष पर नंदा अवतरित होगी और यही अवतारी  पुरूष बड़ी जात निकलने के बारे में अपना रूख स्पष्ट करेगा। इसके चलते बड़ी जात समिति के आयोजक अपने रूख पर कायम हैं।

यात्रा के विवादों में आने के चलते जिलाधिकारी गौरव कुमार की अध्यक्षता में कांसुवा-नौटी तथा नंदा सिद्धपीठ कुरूड के आयोजकों के साथ संवाद में कांसुवा-नौटी के आयोजक तो शामिल नहीं हुए किंतु कुरूड़ के लोग बड़ी जात निकालने को आमादा रहे। कुरूड़ मंदिर समिति के अध्यक्ष सुखवीर रौतेला ने तो साफ तौर पर कहा कि बड़ी जात होगी अथवा नहीं इसका फैसला 23 जनवरी को बसंत पंचमी के दिन मां नंदा अपने अवतारी पुरूष पर अवतरित होकर स्वयं करेगी। मां नंदा के आदेश पर ही भविष्य का कार्यक्रम तय होगा। हालांकि इसी बैठक में जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत सिंह बिष्ट ने बड़ी जात न कराने के संकेत दिए। उन्होंने बैठक में इस बात को स्पष्ट किया कि अभी तक निर्जन पड़ावों पर बुनियादी सुविधाएं विकसित नहीं हो पाई है। इसके चलते बड़ी जात का आयोजन संभव नहीं है। उनके अनुसार पहले व्यवस्थाएं विकसित की जाती थी और तब जात निकालती थी। इस सवाल पर बैठक में मौजूद लोग एक दूसरे की ओर ताक कर जिला पंचायत अध्यक्ष के इरादों को भांप गए। इसी बैठक में मौजूद मुख्यमंत्री के समन्वयक दलवीर दानू ने कहा कि नंदा राजजात की परंपरा यथावत जारी रहनी चाहिए। इसके लिए सभी लोगों को पहले की भांति एकजुटता बनानी होगी। बताया कि पिछले साल के दैवीय  आपदा के कारण आपदा पड़ावों के कामों में गति नहीं आ पाई। इसलिए यात्रा का समय आगे बढ़ाया गया है। बुनियादी सुविधा विकसित होने के बाद यात्रा को भव्य दिव्य बनाया जा सकता है। बताया कि डीएम की निगरानी में एक समिति का गठन किया जाएगा। समिति इस बात को परखेगी कि कहां-कहां काम हुए हैं और कहां-कहां अभी काम होने बाकी है।

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बैठक में मौजूद कुरूड़ बड़ी जात आयोजन समिति के अध्यक्ष कर्नल हरेंद्रसिंह रावत ने तो नंदा की ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि का बखान किया। उनका कहना था कि 750 इसवी में मां नंदा कुरूड़ में शिला रूप में प्रकट हुई थी। इसी लिए यह नंदा सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है। राजशाही का इतिहास करीब 850 इसवी का है। कहा कि सिद्धपीठ कुरूड़ की उपेक्षा होती रही है। अब यह सब नहीं चलेगा। कहा कि नंदा के मायके से ससुराल जाने की इस यात्रा को सियासत का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए। इसलिए इसमें बाधा खड़ी नहीं की जानी चाहिए। कांसुवा-नौटी की राजजात समिति ने एक तरफा फैसला कर अन्य लोगों की एक न सुनी है। इस दौरान कई लोगों ने यह भी कहा कि अभी तक नंदा राजजात की कोई तैयारी नहीं हो पाई है। 2014 में तो आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा था। इस हिसाब से व्यवस्थाएं जुटाई जानी चाहिए। अधिवक्ता डीपी पुरोहित का कहना था कि छंतोलियां पीछे से चलती है और नंदा की डोलियां आगे चलती है। कुरूड़ से नंदा की डोलियां कैलाश को विदा होती है जबकि नौटी से राजा की छंतोलियां चलती है। ईडा बधाणी के उम्मेद सिंह गुसांई कहना था कि नंदा राजजात का यह पहल पड़ाव है। इसके चलते इसका आयोजन ईडा बधाणी  से होना चाहिए। इसलिए इसमें एकमतता बननी चाहिए।

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कांसुवा-नौटी से संचालित होने वाली नंदादेवी राजजात समिति ने  मलमास और मौसमीय चुनौतियों को  लेकर अगले साल यात्रा करने का साफ तौर पर इरादा जता दिया है। अब बसंत पंचमी पर कुरूड़ में निकलने वाली मुहूर्त पर ही सबकी निगाहें टिक गई है। ऐसा इसलिए भी की मां नंदा अवतरित होकर अपने इरादे का ऐलान करेगी। इस तरह कहा जा सकता है कि बसंत पंचमी यानि 23 जनवरी को कुरूड़ से इस वर्ष निकाले जाने वाली बड़ी जात का भविष्य तय होगा।

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