नई दिल्ली। सिंधी देशभक्त क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी हेमू कालाणी की 103वीं जयंती के अवसर पर देशभर में उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। विभिन्न संगठनों और नागरिकों ने उनके बलिदान को याद करते हुए युवाओं से उनके आदर्शों पर चलने का आह्वान किया।

हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) के सुक्कुर में हुआ था। उनके पिता का नाम पेसूमल कालाणी और माता का नाम जेठी बाई था। प्रारंभिक शिक्षा सुक्कुर में ही प्राप्त करने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए और स्वराज सेना के माध्यम से क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई।

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भारत छोड़ो आंदोलन, जिसे अगस्त क्रांति के नाम से जाना जाता है, के दौरान महात्मा गांधी के “करो या मरो” के आह्वान से प्रेरित होकर हेमू कालाणी ने आंदोलन में भाग लिया। वर्ष 1942 में उन्होंने अपने साथियों के साथ ब्रिटिश सैनिकों और गोला-बारूद से भरी ट्रेन को पटरी से उतारने का प्रयास किया। इसी दौरान उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जबकि उनके साथी बच निकलने में सफल रहे।

ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। सिंध के कई गणमान्य लोगों द्वारा दया याचिका दायर की गई, लेकिन शर्त रखी गई कि वे अपने साथियों की जानकारी दें। हेमू कालाणी ने यह शर्त ठुकरा दी और देश के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी।

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21 जनवरी 1943 को मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी दे दी गई। बताया जाता है कि अंतिम समय में उन्होंने पुनः भारत में जन्म लेने की इच्छा जताई और “इंकलाब जिंदाबाद” तथा “भारत माता की जय” के नारों के साथ हंसते-हंसते फांसी को स्वीकार किया।

उनकी शहादत आज भी युवाओं को देशभक्ति और त्याग की प्रेरणा देती है। जयंती के अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि हेमू कालाणी का जीवन साहस, समर्पण और राष्ट्रप्रेम का अद्वितीय उदाहरण है।

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