गोपेश्वर (चमोली)। पहाड़ के जंगल कभी ग्रामीणों की जिंदगी का सहारा हुआ करते थे। चारा-पत्ती, लकड़ी से लेकर पशुपालन और रोजमर्रा की जरूरतों तक गांव की बड़ी आबादी की निर्भरता जंगलों पर रही है। लेकिन अब यही जंगल ग्रामीणों के लिए डर और दहशत का पर्याय बनते जा रहे हैं। चमोली में कुछ ही दिनों के भीतर भालू और बाघ के हमलों की दो घटनाओं ने मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीर होती तस्वीर सामने ला दी है।

पोखरी क्षेत्र में भालू के हमले दौरान दो महिलाओं की चट्टान से गिरकर मौत की घटना अभी ग्रामीणों के जेहन से निकली भी नहीं थी कि जिला मुख्यालय गोपेश्वर के निकट पाडुली गांव में दो महिलाओं पर बाघ ने हमला कर दिया। हालांकि दोनों महिलाएं सुरक्षित बच गईं, लेकिन घटना के बाद गांव में दहशत का माहौल है। सबसे ज्यादा चिंता उन महिलाओं को लेकर है, जिनकी रोजमर्रा की जरूरतें उन्हें मजबूरन जंगल तक ले जाती हैं।

रविवार को पाडुली गांव के जंगल में गर्थातोक के समीप पंडोली धार में जंगल गई दो महिलाओं पर बाघ ने हमला कर दिया। ग्रामीणों के अनुसार बाघ ने महिलाओं को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन दोनों किसी तरह अपनी जान बचाने में सफल रहीं। घटना की सूचना के बाद ग्रामीणों में भय बढ़ गया है।

यह भी पढ़ें :  यूकेडी की अंदरूनी कलह से तीसरी ताकत बनने की उम्मीद को झटका

ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में बाघ की सक्रियता पहले से बनी हुई है। बाघ कई बार आबादी के आसपास दिखाई देने के साथ ही मवेशियों को भी अपना शिकार बना चुका है। अब महिलाओं पर हमला होने के बाद ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है।

पाडुली की घटना से पहले पोखरी विकासखंड के नेल-सिदेली गांव में भालू के हमले ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। जंगल गई दो महिलाओं पर भालू ने हमला कर दिया। अचानक सामने आए भालू से बचने के लिए महिलाएं भागीं, लेकिन इसी दौरान एक महिला चट्टान से नीचे जा गिरी और उसकी मौत हो गई। दूसरी महिला भी गंभीर रूप से घायल हुई।

इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि जंगल से लगे गांवों में रहने वाली महिलाएं अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जंगल जाएं तो जाएं कैसे। जंगल उनके लिए जरूरत भी है और अब खतरे का स्थान भी बनता जा रहा है।

यह भी पढ़ें :  ज्योलिकोट एवं आसपास के क्षेत्रों में जलजनित रोगों की स्थिति पर स्वास्थ्य विभाग की सतत निगरानी – स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल

पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं चारा-पत्ती और लकड़ी जुटाने के लिए जंगल जाती हैं। पशुपालन और कृषि आधारित जीवन में जंगल उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में जंगल में बाघ या भालू की मौजूदगी केवल वन्यजीवों से जुड़ा मामला नहीं, बल्कि सीधे ग्रामीण परिवारों की सुरक्षा और आजीविका से जुड़ा सवाल है।

पाडुली में बाघ के हमले के बाद महिलाओं में भय का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि अब जंगल जाने से पहले कई बार सोचना पड़ रहा है। अकेले जंगल जाने से महिलाएं कतरा रही हैं और समूह में जाने के बावजूद वन्यजीवों के हमले का डर बना हुआ है।

ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग को वन्यजीवों के हमले के बाद कार्रवाई करने के बजाय संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से निगरानी बढ़ानी चाहिए। जिन इलाकों में बाघ और भालू की लगातार सक्रियता है, वहां कैमरा ट्रैप, नियमित गश्त और ग्रामीणों को समय-समय पर सतर्क करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

यह भी पढ़ें :  ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से निपटने के लिए जमीनी स्तर पर जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक – डॉ. पराग मधुकर धकाते

ग्रामीणों की मांग है कि आबादी से लगे जंगलों में वन्यजीवों की गतिविधियों की नियमित निगरानी की जाए और हमलावर वन्यजीवों की पहचान कर सुरक्षा के प्रभावी कदम उठाए जाएं।

लगातार हो रही घटनाएं वन विभाग के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर रही हैं। एक ओर वन्यजीवों का संरक्षण जरूरी है तो दूसरी ओर जंगल से सटे गांवों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

चमोली के पहाड़ी गांवों में बाघ और भालू का बढ़ता खौफ अब केवल वन्यजीवों की मौजूदगी का मामला नहीं रह गया है। यह ग्रामीण महिलाओं की सुरक्षा, उनकी आजीविका और गांवों में सामान्य जनजीवन से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है। जंगल ग्रामीणों की जरूरत हैं, लेकिन अब उन्हें सुरक्षित बनाना भी व्यवस्था की बड़ी जिम्मेदारी है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *