देहरादून: उत्तराखंड के लिए 2027 सिर्फ एक कैलेंडर वर्ष नहीं, बल्कि प्रशासनिक, राजनीतिक और लॉजिस्टिकल स्तर पर एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होने जा रहा है। एक ही साल में विधानसभा चुनाव, हरिद्वार अर्धकुंभ और राष्ट्रीय जनगणना जैसे ये तीन बड़े आयोजन राज्य की सरकारी मशीनरी पर दबाव डालने वाले हैं। यही वजह है कि सरकार ने अभी से तैयारियां तेज कर दी हैं, जबकि सियासी गलियारों में समय से पहले चुनाव की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं।

राज्य की 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव मूल रूप से फरवरी-मार्च 2027 में प्रस्तावित हैं। ठीक उसी दौरान हरिद्वार में अर्धकुंभ का भव्य आयोजन होना है, जो 14 जनवरी 2027 (मकर संक्रांति) से शुरू होकर 20 अप्रैल 2027 (चौत्र पूर्णिमा) तक चलेगा। इसमें 10 प्रमुख स्नान तिथियां हैं, जिनमें फरवरी-मार्च के चार अमृत स्नान (6 फरवरी मौनी अमावस्या, 11 फरवरी बसंत पंचमी, 20 फरवरी माघ पूर्णिमा और मार्च-अप्रैल के अमृत स्नान) शामिल हैं। लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की भीड़, शाही स्नान और अखाड़ों की व्यवस्था को देखते हुए सुरक्षा, ट्रैफिक, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन की चुनौती पहले से ही भारी है।

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चुनाव के दौरान केंद्र और राज्य की सुरक्षा बलों की भारी तैनाती होती है। अर्धकुंभ में भी सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी और अन्य राज्यों से अतिरिक्त फोर्स बुलानी पड़ती है। दोनों आयोजन एक साथ होने पर पुलिस बल, वाहन, कमांड सेंटर और यहां तक कि हेलीकॉप्टरों की डिमांड में टकराव तय है। इसके अलावा जनगणना की प्रक्रिया भी फरवरी-मार्च 2027 के आसपास शुरू होने वाली है, जिसमें हजारों सरकारी कर्मचारियों को घर-घर सर्वे के लिए लगाना पड़ेगा।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में केंद्र से 500 करोड़ रुपये का बजट अर्धकुंभ के लिए हासिल किया है और इसे ‘पूर्ण कुंभ’ की तर्ज पर आयोजित करने का ऐलान किया है। लेकिन, प्रशासनिक अधिकारी मान रहे हैं कि तीन बड़े कार्यक्रमों का एक साथ होना राज्य के लिए बड़ी चुनौती होगी।

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सियासी गलियारों और सोशल मीडिया में इन दिनों यह चर्चा गरम है कि क्या सरकार चुनाव नवंबर-दिसंबर 2026 में करा सकती है? कारण साफ है, अर्धकुंभ जैसा बड़ा और धार्मिक आयोजन, जनवरी से अप्रैल तक होगा। अगर चुनाव फरवरी-मार्च में हुए तो कुंभ की सुरक्षा और चुनावी ड्यूटी में टकराव होना साफ है। ऐसे में सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।

कुछ विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर भाजपा को अपनी वापसी पर भरोसा है तो वह 2026 के अंत में चुनाव करा सकती है, ताकि कुंभ के दौरान शांतिपूर्ण माहौल बना रहे। वहीं अगर विपक्षी दलों (विशेषकर कांग्रेस) की गतिविधियां बढ़ीं तो चुनाव को अप्रैल 2027 (कुंभ समाप्त होने के बाद) तक टाला भी जा सकता है। हालांकि चुनाव आयोग अभी कोई आधिकारिक संकेत नहीं दे रहा है, लेकिन राजनीतिक दलों की तैयारियां 2027 को लक्ष्य करके ही चल रही हैं।

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2027 उत्तराखंड के लिए सिर्फ चुनावी साल नहीं, बल्कि एक अग्निपरीक्षा है। अगर सरकार इन तीनों आयोजनों को सुचारू रूप से संभाल लेती है तो यह उसकी बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन, अगर समय से पहले चुनाव की अटकलें सही साबित हुईं तो यह फैसला प्रशासनिक दबाव कम करने के साथ-साथ राजनीतिक रणनीति भी साबित होगा। फिलहाल सभी की नजरें चुनाव आयोग और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

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