पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)। पहाड़ों से पलायन की त्रासदी अब इतनी गहरी हो चुकी है कि जीते जी तो गांव सूने हो रहे हैं, मरने के बाद भी अंतिम संस्कार के लिए कंधे नहीं मिलते। नेपाल सीमा से सटे दूरस्थ गांव तड़ीगांव में यह हृदय विदारक दृश्य उस समय देखने को मिला, जब करीब 100 वर्षीय बुजुर्ग झूपा देवी का निधन हो गया। गांव में इतने लोग नहीं बचे कि उनकी अर्थी को कंधा दे सकें। मजबूरन ग्रामीणों ने मदद की गुहार सशस्त्र सीमा बल (SSB) के जवानों से लगाई। जवानों ने न केवल अर्थी को कंधा दिया, बल्कि लकड़ियां ढोईं और पूरी अंत्येष्टि का फर्ज निभाया।

यह घटना पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर तड़ीगांव की है। गांव की झूपा देवी का देहांत हो गया। उनका शव गांव से ढाई किलोमीटर दूर काली नदी तट पर स्थित श्मशान घाट तक ले जाना था। लेकिन गांव में मुश्किल से चार-पांच बुजुर्ग पुरुष ही बचे थे, जो खुद चलने में असमर्थ थे। पूर्व प्रधान भूपेंद्र चंद ने बताया, “गांव में युवा नहीं हैं। जो लोग हैं, वे भी वृद्ध हैं। शव यात्रा के लिए कंधे जुटाना मुश्किल हो गया।” आखिरकार नेपाल बॉर्डर पर तैनात SSB पोस्ट से मदद मांगी गई।

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सूचना मिलते ही SSB के दो अधिकारी और चार जवान तुरंत गांव पहुंचे। उन्होंने सम्मानपूर्वक अर्थी को कंधा दिया, चिता के लिए लकड़ियां इकट्ठा कीं और काली नदी तट तक शव पहुंचाया। वहां 65 वर्षीय पुत्र रमेश चंद ने मां को मुखाग्नि दी। यह दृश्य देखकर गांव के बचे-खुचे बुजुर्गों की आंखें नम हो गईं। एक ग्रामीण ने कहा, “सीमा की रक्षा करने वाले जवान आज हमारे गांव के बेटे बन गए।”

तड़ीगांव की यह कहानी उत्तराखंड के हजारों गांवों की पीड़ा को बयां करती है। पलायन के प्रमुख कारण सड़क की कमी और जंगली जानवरों का आतंक है। 2019 में पंचायत ने कच्ची सड़क बनवाई थी, लेकिन आज तक वह पक्की नहीं हुई। जंगली सुअर फसलें बर्बाद कर रहे हैं, जबकि गुलदार और भालू की दहशत से रातें डरावनी हो गई हैं। दो दशक पहले गांव में 37 परिवार थे, अब मात्र 13 बचे हैं, वो भी ज्यादातर बुजुर्ग। युवा रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में मैदानों या शहरों का रुख कर चुके हैं।

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यह घटना न केवल एक बुजुर्ग की अंतिम यात्रा की है, बल्कि उत्तराखंड के खाली होते पहाड़ों की कठोर सच्चाई की है। जहां कभी घरों से बच्चों की किलकारियां और हंसी-ठिठोली गूंजती थी, आज वहां सन्नाटा पसरा है। SSB जवानों की यह मानवीय मदद सराहनीय है, लेकिन सवाल यह है कि कब तक सीमा के रखवाले गांवों के अंतिम संस्कार निभाते रहेंगे? 

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