प्रयागराज : प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में मौनी अमावस्या (18 जनवरी) के पावन अवसर पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुई कथित बदसलूकी और प्रशासनिक कार्रवाई ने विवाद को नया रूप दे दिया है। संत समाज, आचार्य परिषद और राजनीतिक नेताओं ने इसे सनातन धर्म की परंपराओं और संतों के सम्मान पर सीधा हमला बताया है।

घटना की शुरुआत मौनी अमावस्या पर हुई, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी पहिया लगी पालकी में शिष्यों के साथ संगम स्नान के लिए जा रहे थे। मेला प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और भगदड़ की आशंका का हवाला देते हुए पालकी को रोका। शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की शिकायतें सामने आईं, जिसके विरोध में स्वामी जी ने धरना दिया, स्नान से इंकार किया और प्रशासन पर अपमान का आरोप लगाया।

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इसके बाद मेला प्राधिकरण ने दो नोटिस जारी किए:

  • पहला नोटिस बैरियर तोड़ने और बिना अनुमति भीड़ में प्रवेश के आरोप।
  • दूसरा नोटिस सुप्रीम कोर्ट में लंबित ज्योतिष पीठ शंकराचार्य पद से जुड़े मामले का हवाला देते हुए ‘शंकराचार्य’ उपाधि के उपयोग पर सवाल उठाते हुए 24 घंटे में प्रमाण मांगने वाला।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 8 पन्नों का विस्तृत जवाब भेजा, नोटिस को अपमानजनक बताया और लीगल एक्शन की चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि यह सनातन परंपराओं का अपमान है और प्रशासन ने धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कड़ा बयान दिया। उनका कहना है कि शंकराचार्य जी के आग्रह को बलपूर्वक ठुकराकर प्रशासन ने सनातन का अपमान किया है। सरकार संतों के सम्मान की रक्षा करे।

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शारदा पीठ के शंकराचार्य ने इसे सनातन धर्म का अपमान करार दिया। उन्होंने कहा कि भारत के सर्वोच्च धर्म गुरु के साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है, तो आम जनता के साथ क्या नहीं होगा। पंडित दिनकर बाबुलकर ने उत्तर प्रदेश प्रशासन पर सनातन धर्म पर हमला का आरोप लगाते हुए कहा कि “मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सोचना चाहिए कि वे क्या कर रहे हैं। ऐसे अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए।

देवभूमि उत्तराखंड के पंडा समाज इसकी निंदा करता है। वृंदावन के प्रेमानंद महाराज ने वीडियो जारी कर पूर्ण समर्थन जताया। किसान नेता राकेश टिकैत, प्रवीण तोगड़िया और अन्य ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर अतिक्रमण बताया। कांग्रेस ने भी योगी सरकार की आलोचना की।

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