बागेश्वर : जनपद बागेश्वर में हालिया प्रशासनिक तबादलों ने एक बार फिर उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर बहस छेड़ दी है। खासकर जिलाधिकारी आकांक्षा कोंडे के तबादले को लेकर लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या ईमानदारी और जनहित में काम करने वाले अधिकारियों के लिए अब स्वतंत्र रूप से काम करना कठिन होता जा रहा है।

बागेश्वर में जिलाधिकारी के रूप में अपने लगभग सात महीने के कार्यकाल के दौरान आकांक्षा कोंडे ने कई महत्वपूर्ण विकास कार्यों को गति दी। प्रशासनिक सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार उन्होंने बंद पड़ी आर्थिक इकाइयों को पुनर्जीवित करने, महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने, आपदा पुनर्निर्माण योजनाओं को आगे बढ़ाने और कृषि आधारित आजीविका को प्रोत्साहित करने की दिशा में सक्रिय पहल की।

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जनपद में अल्मोड़ा मैग्नेसाइट फैक्ट्री और कौसानी चाय फैक्ट्री जैसी बंद इकाइयों को दोबारा संचालित कराने की प्रक्रिया शुरू हुई, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार की संभावनाएं बढ़ीं। वहीं खड़िया खनन पर लगी रोक हटने से क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी राहत मिलने की बात कही जा रही है।

कपकोट क्षेत्र में ‘कुटकी’ की खेती को बढ़ावा देकर ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसके अलावा आपदा पुनर्निर्माण से जुड़ी करोड़ों रुपये की परियोजनाओं को स्वीकृति दिलाने तथा लंबे समय से लंबित विज्ञान संकाय भवन को विद्यार्थियों के लिए समर्पित करने जैसे कार्य भी उनके कार्यकाल की उपलब्धियों में गिने जा रहे हैं।

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हालांकि उनके तबादले के बाद राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक स्थिरता को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई सामाजिक और स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि कोई अधिकारी अनुशासन, पारदर्शिता और जनहित को प्राथमिकता देता है तथा राजनीतिक दबाव से अलग रहकर कार्य करता है, तो क्या उसे व्यवस्था में लंबे समय तक काम करने का अवसर मिल पाता है?

विशेष रूप से एक महिला अधिकारी के रूप में आकांक्षा कोंडे की कार्यशैली को लेकर भी चर्चा हो रही है। लोगों का कहना है कि उन्होंने संवेदनशीलता और दृढ़ता के साथ प्रशासन चलाने का प्रयास किया, लेकिन लगातार तबादलों की संस्कृति विकास कार्यों की निरंतरता को प्रभावित करती है।

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विश्लेषकों का मानना है कि बार-बार होने वाले प्रशासनिक बदलावों से योजनाओं की गति प्रभावित होती है। अधिकारी जब तक क्षेत्र की समस्याओं और जरूरतों को पूरी तरह समझ पाते हैं, तब तक तबादले की स्थिति बन जाती है। इसका सीधा असर विकास कार्यों और आम जनता पर पड़ता है।

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