नई दिल्ली : इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कमजोर रहने की संभावना ने चिंता बढ़ा दी है। दो वर्षों तक अच्छी बारिश के बाद इस बार कम वर्षा का अनुमान लगाया गया है, जिसका सीधा असर देश की खेती और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत की करीब आधी कृषि मानसून पर निर्भर है, ऐसे में धान, दालों और तिलहन की बुवाई व उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अपने पहले आधिकारिक पूर्वानुमान में कहा है कि जून से सितंबर के बीच देश में कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 92 प्रतिशत रहने की संभावना है। एलपीए (1971–2020) 87 सेंटीमीटर है, और 90 से 95 प्रतिशत के बीच की बारिश को सामान्य से कम माना जाता है। निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट ने भी करीब 94 प्रतिशत वर्षा का अनुमान जताया है।

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आईएमडी के महानिदेशक डॉ. एम. महापात्रा के अनुसार, मानसूनी वर्षा में लगभग 5 प्रतिशत तक की कमी या बढ़ोतरी संभव है। हालांकि पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा होने की उम्मीद है, लेकिन बाकी क्षेत्रों में कम बारिश की आशंका है।

कमजोर मानसून का एक बड़ा कारण जून के आसपास प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति का बनना बताया जा रहा है। आमतौर पर अल नीनो के दौरान भारत में वर्षा घटती है और सूखे की स्थिति बन सकती है। हालांकि, हिंद महासागर में सकारात्मक आईओडी (इंडियन ओशन डाइपोल) बनने के संकेत हैं, जो मानसून के दूसरे हिस्से में अल नीनो के असर को कुछ हद तक कम कर सकता है।

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भारत के लिए मानसून बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश की कुल वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत इसी मौसम में होता है। यह न सिर्फ खेती बल्कि पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए भी जरूरी है। वर्तमान में केवल करीब 55 प्रतिशत खेती योग्य भूमि ही सिंचाई के दायरे में है, जिससे मानसून पर निर्भरता और बढ़ जाती है।

अगर वर्षा कम रहती है, तो फसलों का उत्पादन घट सकता है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने का खतरा है। इसके अलावा, ग्रामीण आय में कमी आने से बाजार में मांग घट सकती है, जिसका असर देश की आर्थिक वृद्धि दर पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में मानसून की स्थिति पर करीबी नजर रखना जरूरी होगा, ताकि संभावित चुनौतियों से समय रहते निपटा जा सके।

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