नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को मौद्रिक नीति समीक्षा में आर्थिक वृद्धि को लेकर चिंता जताते हुए चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। वहीं खुदरा महंगाई (CPI) का अनुमान बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखने का फैसला किया है।

आरबीआई के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और मानसून को लेकर अनिश्चितता भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौतियां हैं। इन्हीं कारणों से विकास दर के अनुमान में कटौती और महंगाई के अनुमान में वृद्धि की गई है।

क्यों बढ़ी चिंता?

आरबीआई गवर्नर ने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी हुई है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो परिवहन, ऊर्जा और उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा। इसके अलावा कमजोर मानसून की आशंका खाद्य वस्तुओं की कीमतों को भी प्रभावित कर सकती है।

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आरबीआई ने अनुमान लगाया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में औसत खुदरा महंगाई 5.1 प्रतिशत रह सकती है, जो पहले के 4.6 प्रतिशत अनुमान से अधिक है।

आपकी जेब पर क्या होगा असर?

1. घरेलू बजट पर दबाव

महंगाई बढ़ने का सबसे अधिक असर रसोई के बजट पर पड़ सकता है। खाद्यान्न, सब्जियां, ईंधन और दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी होने की आशंका है। इससे परिवारों का मासिक खर्च बढ़ सकता है।

2. पेट्रोल-डीजल महंगे होने का खतरा

कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे परिवहन लागत बढ़ेगी और कई वस्तुओं के दाम भी प्रभावित होंगे।

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3. लोन की ईएमआई फिलहाल स्थिर

आरबीआई ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। ऐसे में होम लोन, ऑटो लोन और अन्य फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज की ईएमआई में तत्काल कोई बदलाव नहीं होगा। हालांकि भविष्य में महंगाई लगातार बढ़ी तो ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

4. रोजगार और निवेश पर असर

विकास दर का अनुमान घटने का अर्थ है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार पहले की तुलना में कुछ धीमी रह सकती है। इसका असर निजी निवेश, उद्योगों के विस्तार और रोजगार सृजन पर पड़ सकता है।

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बाजार की प्रतिक्रिया

आरबीआई के फैसले के बाद शेयर बाजार में स्थिरता देखने को मिली। निवेशकों ने इसे सतर्क लेकिन संतुलित कदम माना है। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि उसका फोकस आर्थिक वृद्धि और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने पर रहेगा।

आगे क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतें, मानसून की स्थिति और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम आरबीआई की अगली नीतियों को प्रभावित करेंगे। यदि महंगाई और बढ़ती है तो ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है, जबकि परिस्थितियां सामान्य रहने पर दरों को स्थिर रखा जा सकता है।

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