पीपलकोठी (चमोली)। उत्तराखंड की पारंपरिक हस्तशिल्प कला ‘रिंगाल’ अब न केवल पहाड़ की पहचान बन रही है, बल्कि आधुनिक तकनीक के समावेश से स्थानीय शिल्पियों की आय का मुख्य जरिया भी साबित हो रही है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए पीपलकोटी ग्रोथ सेंटर में अनुसूचित जाति उपयोजना (SCP) के अंतर्गत जिला उद्योग केंद्र चमोली के सहयोग से संचालित एक माह का विशेष रिंगाल प्रशिक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। एक महीने तक चले इस गहन प्रशिक्षण शिविर में 24 प्रशिक्षणार्थियों को रिंगाल से आकर्षक और बाजार की मांग के अनुरूप शानदार उत्पाद बनाने की बारीकियां सिखाई गईं। शिल्पियों ने बांस और रिंगाल के मेल से घरेलू उपयोग के साथ-साथ सजावटी सामान तैयार करने की आधुनिक विधाएं सीखीं, जिससे उनके उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सकेगी।

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समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंची नगर पंचायत अध्यक्षा आरती नवानी ने शिल्पियों द्वारा तैयार उत्पादों की सराहना करते हुए कहा कि स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग और आधुनिक प्रशिक्षण ही आत्मनिर्भर उत्तराखंड की नींव बनेगा। जिला उद्योग केंद्र की महाप्रबंधक अंजलि रमन ने शिल्पियों को प्रोत्साहित करते हुए बताया कि विभाग द्वारा इन उत्पादों की मार्केटिंग और बिक्री के लिए हर संभव मदद दी जाएगी। उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद के जिला समन्वयक आशीष प्रसाद ने तकनीक और गुणवत्ता पर जोर देते हुए बताया कि किस तरह से पारंपरिक उत्पादों को नया रूप देकर अंतरराष्ट्रीय बाजार की प्रतिस्पर्धा में उतारा जा सकता है। कार्यक्रम में पार्षद रमेश लाल, धर्म लाल, प्रदीप कुमार और पूजा देवी सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे। प्रशासन का मानना है कि रिंगाल उद्योग में आ रहे इस बदलाव से पलायन पर रोक लगेगी और स्थानीय युवाओं को गांव में ही सम्मानजनक स्वरोजगार प्राप्त होगा।

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