देहरादून : धर्मपुर चौक स्थित सिद्धपीठ प्राचीन श्री शिव मंदिर में श्रावण मास के पावन अवसर पर आयोजित दिव्य एवं भव्य संगीतमय श्री शिव महापुराण ज्ञान महायज्ञ के षष्ठम दिवस पर कथा व्यास एवं शिव आराधक आचार्य सुभाष जोशी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि शिव का वास्तविक अर्थ ही ‘कल्याणकारी भाव’ है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव बाहरी आडंबर या भव्य पूजन सामग्री से नहीं, बल्कि भक्त के निर्मल, निष्कपट और पवित्र भाव से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। इसी कारण उन्हें ‘आशुतोष’ कहा जाता है।

आचार्य सुभाष जोशी ने अपने प्रवचन में बताया कि श्री शिव महापुराण के अनुसार यदि मनुष्य के हृदय में सबके कल्याण की भावना, दया, करुणा और सेवा का भाव है, तो वही सर्वोच्च शिवभक्ति है। भगवान शिव को श्रद्धा से अर्पित किया गया एक लोटा जल और बेलपत्र भी भक्त के सच्चे भाव के कारण उन्हें अत्यंत प्रिय होता है। उन्होंने कहा कि भूखे को भोजन कराना, प्यासे को जल पिलाना, माता-पिता की सेवा करना तथा समाज के प्रति करुणा का भाव रखना भी भगवान शिव की सच्ची आराधना है।

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उन्होंने कहा कि भगवान शिव का संपूर्ण जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित रहा है। समुद्र मंथन के समय विषपान कर संसार की रक्षा करना तथा अहंकार का नाश कर धर्म की स्थापना करना शिव के कल्याणकारी स्वरूप के प्रमुख उदाहरण हैं। जब मनुष्य अपने मन से ईर्ष्या, द्वेष और स्वार्थ का त्याग कर सबके हित की भावना अपनाता है, तब उसके हृदय में स्वयं भगवान शिव का वास होता है।

कथा प्रसंग के दौरान आचार्य सुभाष जोशी ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ और माता सती की मार्मिक कथा का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, किंतु भगवान शिव को नहीं बुलाया गया। माता सती ने पिता के यज्ञ में जाने का आग्रह किया, जबकि भगवान शिव ने बिना निमंत्रण जाने से मना किया। यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने पर माता सती ने योगाग्नि द्वारा अपने प्राण त्याग दिए।

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आचार्य ने आगे बताया कि माता सती के वियोग में भगवान शिव ने उनके पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव किया। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के अंगों को पृथक किया, जो आगे चलकर शक्तिपीठों के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इसके उपरांत माता सती ने पर्वतराज हिमालय के घर माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। माता पार्वती ने भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी अटूट श्रद्धा, भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनकी परीक्षा ली तथा अंततः उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। दोनों का दिव्य विवाह सनातन परंपरा में आदर्श दांपत्य का प्रतीक माना जाता है।

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आज की कथा के यजमान अशोक तिवारी केंद्रीय मंत्री अखिल भारतीय धर्माचार्य, अजय कुमार संगठन मंत्री प्रदेश, पूर्व महापौर सुनील उनियाल गामा, शरद शर्मा, स्मृति, सरोजनी नौटियाल, अर्जुन पुण्डीर, विवेक कपूर, रीता कपूर, मदन हुरला, अर्चना ठाकुर, सुदेश हुरला एवं अन्य शिवभक्त रहे। श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद की व्यवस्था रामकुमार तायल एवं अन्य शिवभक्तों के सहयोग से की गई।

इस अवसर पर मंदिर समिति के अध्यक्ष सीताराम भट्ट, देवेन्द्र अग्रवाल, दीपक शर्मा, मदन हुरला, आत्माराम शर्मा, जयप्रकाश बंसल, शरद शर्मा, प्रमोद शर्मा, सुनील कौशिक, संदीप कुमार, अर्चना ठाकुर, सुदेश हुरला, शर्मिला भट्ट, मंजू, अन्नू सहित मंदिर समिति के पदाधिकाजीरी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी श्रद्धालुओं ने शिव महापुराण कथा का श्रवण कर पुण्यार्जन प्राप्त किया।

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